शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017
मंगलवार, 5 दिसंबर 2017
मध्यप्रदेश मेवाडा माली समाज चोखला पंचायत समिति की प्रदेश स्तरीय बैठक संपन्न हुई।
Unknown
दिसंबर 05, 2017
मध्यप्रदेश मेवाडा माली समाज चोखला पंचायत समिति की प्रदेश स्तरीय बैठक संपन्न हुई।👍
3 दिसंबर रविवार 2017 मेवाडा माली समाज धर्मशाला बगिया रोड भागीरथपुरा लक्ष्मी बाई रेलवे स्टेशन के पास।
मेवाडा माली समाज मध्य प्रदेश की प्रांतीय बैठक का आयोजन हुआ।
जिसमें मध्य प्रदेश के जिले भोपाल, सीहोर, होशंगाबाद, देवास, धार, इंदौर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर, नीमच, के समाज प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
बैठक की खास बात यह रही कि प्रत्येक जिले के तहसील एवं छोटे से छोटे गांव, पचायतो से भी समाज बंधु आए थे।
बाहर से पधारे सभी समाज बंधुओं का विधिवत रूप से पंजीयन किया गया तत्पश्चात स्वल्पाहार एवं चाय की व्यवस्था रखी गई थी।
बेठक का शुभारंभ सर्वप्रथम मां सरस्वती एवं महात्मा ज्योतिबा फुले की तस्वीर पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित समाज के वरिष्ठ ने किया।
तत्पश्चात समाज के वरिष्ठो का मार्गदर्शन उद्बोधन के रूप में मिला।
युवाओं ने भी अपने विचार रखें, सभी ने मिलकर प्रदेश स्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव पास किया, जिसमें छोटे से छोटे गांव, तहसील, पंचायत या जिले स्तर के प्रतिनिधियों की सहभागिता सुनिश्चित की गई।
तत्पश्चात तय किया गया की यह "समिति" सभी से विचार विमर्श कर प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की घोषणा वरिष्ठों की उपस्थिति में करेगी।
राष्ट्रीय स्तर के कबड्डी खिलाड़ी हॉट पिपलिया के "सावन उत्परिया" 💐का 🌷सम्मान🌷 भी बैठक में किया गया।
बैठक के पश्चात सभी समाज बंधुओं की भोजन व्यवस्था भी रखी गई थी।
3 दिसंबर रविवार 2017 मेवाडा माली समाज धर्मशाला बगिया रोड भागीरथपुरा लक्ष्मी बाई रेलवे स्टेशन के पास।
मेवाडा माली समाज मध्य प्रदेश की प्रांतीय बैठक का आयोजन हुआ।
जिसमें मध्य प्रदेश के जिले भोपाल, सीहोर, होशंगाबाद, देवास, धार, इंदौर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर, नीमच, के समाज प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
बैठक की खास बात यह रही कि प्रत्येक जिले के तहसील एवं छोटे से छोटे गांव, पचायतो से भी समाज बंधु आए थे।
बाहर से पधारे सभी समाज बंधुओं का विधिवत रूप से पंजीयन किया गया तत्पश्चात स्वल्पाहार एवं चाय की व्यवस्था रखी गई थी।
बेठक का शुभारंभ सर्वप्रथम मां सरस्वती एवं महात्मा ज्योतिबा फुले की तस्वीर पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलित समाज के वरिष्ठ ने किया।
तत्पश्चात समाज के वरिष्ठो का मार्गदर्शन उद्बोधन के रूप में मिला।
युवाओं ने भी अपने विचार रखें, सभी ने मिलकर प्रदेश स्तरीय समिति गठित करने का प्रस्ताव पास किया, जिसमें छोटे से छोटे गांव, तहसील, पंचायत या जिले स्तर के प्रतिनिधियों की सहभागिता सुनिश्चित की गई।
तत्पश्चात तय किया गया की यह "समिति" सभी से विचार विमर्श कर प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की घोषणा वरिष्ठों की उपस्थिति में करेगी।
राष्ट्रीय स्तर के कबड्डी खिलाड़ी हॉट पिपलिया के "सावन उत्परिया" 💐का 🌷सम्मान🌷 भी बैठक में किया गया।
बैठक के पश्चात सभी समाज बंधुओं की भोजन व्यवस्था भी रखी गई थी।
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शनिवार, 2 दिसंबर 2017
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मृत्युभोज पर एक लघु लेख जरूर पड़े
Unknown
दिसंबर 02, 2017
* मृत्यु भोज पर एक लघु लेख भेजा है* ,वह मुझे तो पसन्द आया।ऐसी सामाजि क कुरीति पर शानदार कटाक्ष किया है।आप भी पढे।)
जश्न-ऐ-मौत।मृत्यु भोज, एक सामाजिक कलंक !!!
इंसान स्वार्थ व खाने के लालच में कितना गिरता है उसका नमूना होती है सामाजिक कुरीतियां। ऐसी ही एक पीड़ा देने वाली कुरीति वर्षों पहले भोले-भाल हिन्दुओ में फैलाई गई थी वो है -मृत्युभोज!!! मानव विकास के रास्ते में यह गंदगी कैसे पनप गयी, समझ से परे है। जानवर भी अपने किसी साथी के मरने पर मिलकर दुःख प्रकट करते हैं, इंसानी बेईमान दिमाग की करतूतें देखो कि यहाँ किसी व्यक्ति के मरने पर उसके साथी, सगे-सम्बन्धी भोज करते हैं। मिठाईयाँ खाते हैं। किसी घर में खुशी का मौका हो, तो समझ आता है कि मिठाई बनाकर, खिलाकर खुशी का इजहार करें, खुशी जाहिर करें। लेकिन किसी व्यक्ति के मरने पर मिठाईयाँ परोसी जायें, खाई जायें, इस शर्मनाक परम्परा को मानवता की किस श्रेणी में रखें? इंसान की गिरावट को मापने का पैमाना कहाँ खोजे? इस भोज के भी अलग-अलग तरीके हैं। कहीं पर यह एक ही दिन में किया जाता है। कहीं तीसरे दिन से शुरू होकर बारहवें-तेहरवें दिन तक चलता है। कई लोग श्मशान घाट से ही सीधे मृत्युभोज का सामान लाने निकल पड़ते हैं। मैंने तो ऐसे लोगों को सलाह भी दी कि क्यों न वे श्मशान घाट पर ही टेंट लगाकर जीम लें ताकि अन्य जानवर आपको गिद्ध से अलग समझने की भूल न कर बैठे !
रिश्तेदारों को तो छोड़ो, पूरा गांव का गाँव व आसपास का पूरा क्षेत्र टूट पड़ता है खाने को! तब यह हैसियत दिखाने का अवसर बन जाता है। आस-पास के कई गाँवों से ट्रेक्टर-ट्रोलियों में गिद्धों की भांति जनता इस घृणित भोज पर टूट पड़ती है।
जब मैंने समाज के बुजुर्गों से बात की व इस कुरीति के चलन के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि उनके जमाने में ऐसा नहीं था। रिश्तेदार ही घर पर मिलने आते थे। उन्हें पड़ोसी भोजन के लिए ले जाया करते थे। सादा भोजन करवा देते थे। मृत व्यक्ति के घर बारह दिन तक कोई भोजन नहीं बनता था। 13 वें दिन कुछ सादे क्रियाकर्म होते थे। परिजन बिछुड़ने के गम को भूलने के लिए मानसिक सहारा दिया जाता था। लेकिन हम कहाँ पहुंच गए! परिजन के बिछुड़ने के बाद उनके परिवार वालों को जिंदगीभर के लिए एक और जख्म दे देते है।जीते जी चाहे इलाज के लिए 2,00 रुपये उधार न दिए हो लेकिन मृत्युभोज के लिए 6-7 लाख का कर्जा ओढ़ा देते है। ऐसा नहीं करो तो समाज में इज्जत नहीं बचेगी! क्या गजब पैमाने बनाये हैं हमने इज्जत के? इंसानियत को शर्मसार करके, परिवार को बर्बाद करके इज्जत पाने का पैमाना! कहीं-कहीं पर तो इस अवसर पर अफीम की मनुहार भी करनी पड़ती है। इसका खर्च मृत्युभोज के बराबर ही पड़ता है। जिनके कंधों पर इस कुरीति को रोकने का जिम्मा है वो नेता-अफसर खुद अफीम का जश्न मनाते नजर आते है। कपड़ों का लेन-देन भी ऐसे अवसरों पर जमकर होता है। कपड़े, केवल दिखाने के, पहनने लायक नहीं। बाप एक का मरा पगड़ी पुरै परीवार ने पहन ली बरबादी का ऐसा नंगा नाच, जिस समाज में चल रहा हो, वहाँ पर पूँजी कहाँ बचेगी? बच्चे कैसे पढ़ेंगे?बीमारों का इलाज कैसे होगा?
घिन्न आती है जब यह देखते हैं कि जवान मौतों पर भी समाज के लोग जानवर बनकर मिठाईयाँ उड़ा रहे होते हैं। गिद्ध भी गिद्ध को नहीं खाता! पंजे वाले जानवर पंजे वाले जानवर को खाने से बचते है। लेकिन इंसानी चोला पहनकर घूम रहे ये दोपाया जानवरों को शर्म भी नहीं आती जब जवान बाप या माँ के मरने पर उनके बच्चे अनाथ होकर, सिर मुंडाये आस-पास घूम रहे होते हैं। और समाज के प्रतिष्ठित लोग उस परिवार की मदद करने के स्थान पर भोज कर रहे होते हैं।
जब भी बात करते है कि इस घिनौने कृत्य को बंद करो तो समाज के ऐसे-ऐसे कुतर्क शास्त्री खड़े हो जाते है कि इनके तर्क देखिए.....
A) माँ-बाप जीवन भर तुम्हारे लिए कमाकर गये हैं, तो उनके लिए हम कुछ नहीं करोगे ??
इमोशनल अत्याचार शुरू कर देते है! चाहे अपना बाप घर के कोने में भूखा पड़ा हो लेकिन यहां ज्ञान बांटने जरूर आ जाता है! हकीकत तो यह है कि आजकल अधिकांश माँ-बाप कर्ज ही छोड़ कर जा रहे हैं। उनकी जीवन भर की कमाई भी तो कुरीतियों और दिखावे की भेंट चढ़ गयी। फिर अगर कुछ पैसा उन्होंने हमारे लिए रखा भी है, तो यह उनका फर्ज था। हम यही कर सकते हैं कि जीते जी उनकी सेवा कर लें। लेकिन जीते जी तो हम उनसे ठीक से बात नहीं करते। वे खोंसते रहते हैं, हम उठकर दवाई नहीं दे पाते हैं। अचरज होता है कि वही लोग बड़ा मृत्युभोज या दिखावा करते हैं, जिनके माँ-बाप जीवन भर तिरस्कृत रहे। खैर! चलिए, अगर माँ-बाप ने हमारे लिए कमाया है, तो उनकी याद में हम कई जनहित के कार्य कर सकते हैं, पुण्य कर सकते हैं। जरूरतमंदो की मदद कर दें, अस्पताल-स्कूल के कमरे बना दें, पेड़ लगा दें।परन्तु हट्टे-कट्टे लोगों को भोजन करवाने से कैसा पुण्य होगा? कुछ बुजुर्ग तो दो साल पहले इस चिंता के कारण मर जाते है कि मेरी मौत पर मेरा समाज ही मेरे बच्चों को नोंच डालेगा! मरने वाले को भी शांति से नहीं मरने देते हो! कैसा फर्ज व कैसा धर्म है तुम्हारा ??
B) आये मेहमानों को भूखा ही भेज दें ??
पहली बात को शोक प्रकट करने आने वाले रिश्तेदार और मित्र, मेहमान नहीं होते हैं। उनको भी सोचना चाहिये कि शोक संतृप्त परिवार को और दुखी क्यों करें ?? अब तो साधन भी बहुत हैं। सुबह से शाम तक वापिस अपने घर पहुँचा जा सकता है। इस घिसे-पिटे तर्क को किनारे रख दें। मेहमाननवाजी खुशी के मौकों पर की जाती है, मौत पर नहीं!! बेहतर यही होगा कि हम जब शोक प्रकट करने जायें, तो खुद ही भोजन या अन्य मनुहार को नकार दें। समस्या ही खत्म हो जायेगी।
C) तुमने भी तो खाया था तो खिलाना पड़ेगा !!
यह मुर्ग़ी पहले आई या अंडा पहले आया वाला नाटक बंद करो। यह समस्या कभी नहीं सुलझेगी! अब आप बुला लो, फिर वे बुलायेंगे। फिर कुछ और लोग जोड़ दो। इनसानियत पहले से ही इस कृत्य पर शर्मिंदा है, अब और मत करो। किसी व्यक्ति के मरने पर उसके घर पर जाकर भोजन करना ही इंसानी बेईमानी की पराकाष्ठा है और अब इतनी पढ़ाई-लिखाई के बाद तो यह चीज प्रत्येक समझदामर व्यक्ति को मान लेनी चाहिए। गाँव और क़स्बों में गिद्धों की तरह मृत व्यक्तियों के घरों में मिठाईयों पर टूट पड़ते लोगों की तस्वीरें अब दिखाई नहीं देनी चाहिए।
इस कुरीति को मिटाने का एक ही उपाय है कि
आओ आप और हम ये सपथ ले की हम इस प्रकार के आयोजनों में भोजन नही करेंगे
धन्यवाद .
.सोच बदले .....समाज बदले ... ..
हम सुधरेंगे ....समाज सुधरेगा
जश्न-ऐ-मौत।मृत्यु भोज, एक सामाजिक कलंक !!!
इंसान स्वार्थ व खाने के लालच में कितना गिरता है उसका नमूना होती है सामाजिक कुरीतियां। ऐसी ही एक पीड़ा देने वाली कुरीति वर्षों पहले भोले-भाल हिन्दुओ में फैलाई गई थी वो है -मृत्युभोज!!! मानव विकास के रास्ते में यह गंदगी कैसे पनप गयी, समझ से परे है। जानवर भी अपने किसी साथी के मरने पर मिलकर दुःख प्रकट करते हैं, इंसानी बेईमान दिमाग की करतूतें देखो कि यहाँ किसी व्यक्ति के मरने पर उसके साथी, सगे-सम्बन्धी भोज करते हैं। मिठाईयाँ खाते हैं। किसी घर में खुशी का मौका हो, तो समझ आता है कि मिठाई बनाकर, खिलाकर खुशी का इजहार करें, खुशी जाहिर करें। लेकिन किसी व्यक्ति के मरने पर मिठाईयाँ परोसी जायें, खाई जायें, इस शर्मनाक परम्परा को मानवता की किस श्रेणी में रखें? इंसान की गिरावट को मापने का पैमाना कहाँ खोजे? इस भोज के भी अलग-अलग तरीके हैं। कहीं पर यह एक ही दिन में किया जाता है। कहीं तीसरे दिन से शुरू होकर बारहवें-तेहरवें दिन तक चलता है। कई लोग श्मशान घाट से ही सीधे मृत्युभोज का सामान लाने निकल पड़ते हैं। मैंने तो ऐसे लोगों को सलाह भी दी कि क्यों न वे श्मशान घाट पर ही टेंट लगाकर जीम लें ताकि अन्य जानवर आपको गिद्ध से अलग समझने की भूल न कर बैठे !
रिश्तेदारों को तो छोड़ो, पूरा गांव का गाँव व आसपास का पूरा क्षेत्र टूट पड़ता है खाने को! तब यह हैसियत दिखाने का अवसर बन जाता है। आस-पास के कई गाँवों से ट्रेक्टर-ट्रोलियों में गिद्धों की भांति जनता इस घृणित भोज पर टूट पड़ती है।
जब मैंने समाज के बुजुर्गों से बात की व इस कुरीति के चलन के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि उनके जमाने में ऐसा नहीं था। रिश्तेदार ही घर पर मिलने आते थे। उन्हें पड़ोसी भोजन के लिए ले जाया करते थे। सादा भोजन करवा देते थे। मृत व्यक्ति के घर बारह दिन तक कोई भोजन नहीं बनता था। 13 वें दिन कुछ सादे क्रियाकर्म होते थे। परिजन बिछुड़ने के गम को भूलने के लिए मानसिक सहारा दिया जाता था। लेकिन हम कहाँ पहुंच गए! परिजन के बिछुड़ने के बाद उनके परिवार वालों को जिंदगीभर के लिए एक और जख्म दे देते है।जीते जी चाहे इलाज के लिए 2,00 रुपये उधार न दिए हो लेकिन मृत्युभोज के लिए 6-7 लाख का कर्जा ओढ़ा देते है। ऐसा नहीं करो तो समाज में इज्जत नहीं बचेगी! क्या गजब पैमाने बनाये हैं हमने इज्जत के? इंसानियत को शर्मसार करके, परिवार को बर्बाद करके इज्जत पाने का पैमाना! कहीं-कहीं पर तो इस अवसर पर अफीम की मनुहार भी करनी पड़ती है। इसका खर्च मृत्युभोज के बराबर ही पड़ता है। जिनके कंधों पर इस कुरीति को रोकने का जिम्मा है वो नेता-अफसर खुद अफीम का जश्न मनाते नजर आते है। कपड़ों का लेन-देन भी ऐसे अवसरों पर जमकर होता है। कपड़े, केवल दिखाने के, पहनने लायक नहीं। बाप एक का मरा पगड़ी पुरै परीवार ने पहन ली बरबादी का ऐसा नंगा नाच, जिस समाज में चल रहा हो, वहाँ पर पूँजी कहाँ बचेगी? बच्चे कैसे पढ़ेंगे?बीमारों का इलाज कैसे होगा?
घिन्न आती है जब यह देखते हैं कि जवान मौतों पर भी समाज के लोग जानवर बनकर मिठाईयाँ उड़ा रहे होते हैं। गिद्ध भी गिद्ध को नहीं खाता! पंजे वाले जानवर पंजे वाले जानवर को खाने से बचते है। लेकिन इंसानी चोला पहनकर घूम रहे ये दोपाया जानवरों को शर्म भी नहीं आती जब जवान बाप या माँ के मरने पर उनके बच्चे अनाथ होकर, सिर मुंडाये आस-पास घूम रहे होते हैं। और समाज के प्रतिष्ठित लोग उस परिवार की मदद करने के स्थान पर भोज कर रहे होते हैं।
जब भी बात करते है कि इस घिनौने कृत्य को बंद करो तो समाज के ऐसे-ऐसे कुतर्क शास्त्री खड़े हो जाते है कि इनके तर्क देखिए.....
A) माँ-बाप जीवन भर तुम्हारे लिए कमाकर गये हैं, तो उनके लिए हम कुछ नहीं करोगे ??
इमोशनल अत्याचार शुरू कर देते है! चाहे अपना बाप घर के कोने में भूखा पड़ा हो लेकिन यहां ज्ञान बांटने जरूर आ जाता है! हकीकत तो यह है कि आजकल अधिकांश माँ-बाप कर्ज ही छोड़ कर जा रहे हैं। उनकी जीवन भर की कमाई भी तो कुरीतियों और दिखावे की भेंट चढ़ गयी। फिर अगर कुछ पैसा उन्होंने हमारे लिए रखा भी है, तो यह उनका फर्ज था। हम यही कर सकते हैं कि जीते जी उनकी सेवा कर लें। लेकिन जीते जी तो हम उनसे ठीक से बात नहीं करते। वे खोंसते रहते हैं, हम उठकर दवाई नहीं दे पाते हैं। अचरज होता है कि वही लोग बड़ा मृत्युभोज या दिखावा करते हैं, जिनके माँ-बाप जीवन भर तिरस्कृत रहे। खैर! चलिए, अगर माँ-बाप ने हमारे लिए कमाया है, तो उनकी याद में हम कई जनहित के कार्य कर सकते हैं, पुण्य कर सकते हैं। जरूरतमंदो की मदद कर दें, अस्पताल-स्कूल के कमरे बना दें, पेड़ लगा दें।परन्तु हट्टे-कट्टे लोगों को भोजन करवाने से कैसा पुण्य होगा? कुछ बुजुर्ग तो दो साल पहले इस चिंता के कारण मर जाते है कि मेरी मौत पर मेरा समाज ही मेरे बच्चों को नोंच डालेगा! मरने वाले को भी शांति से नहीं मरने देते हो! कैसा फर्ज व कैसा धर्म है तुम्हारा ??
B) आये मेहमानों को भूखा ही भेज दें ??
पहली बात को शोक प्रकट करने आने वाले रिश्तेदार और मित्र, मेहमान नहीं होते हैं। उनको भी सोचना चाहिये कि शोक संतृप्त परिवार को और दुखी क्यों करें ?? अब तो साधन भी बहुत हैं। सुबह से शाम तक वापिस अपने घर पहुँचा जा सकता है। इस घिसे-पिटे तर्क को किनारे रख दें। मेहमाननवाजी खुशी के मौकों पर की जाती है, मौत पर नहीं!! बेहतर यही होगा कि हम जब शोक प्रकट करने जायें, तो खुद ही भोजन या अन्य मनुहार को नकार दें। समस्या ही खत्म हो जायेगी।
C) तुमने भी तो खाया था तो खिलाना पड़ेगा !!
यह मुर्ग़ी पहले आई या अंडा पहले आया वाला नाटक बंद करो। यह समस्या कभी नहीं सुलझेगी! अब आप बुला लो, फिर वे बुलायेंगे। फिर कुछ और लोग जोड़ दो। इनसानियत पहले से ही इस कृत्य पर शर्मिंदा है, अब और मत करो। किसी व्यक्ति के मरने पर उसके घर पर जाकर भोजन करना ही इंसानी बेईमानी की पराकाष्ठा है और अब इतनी पढ़ाई-लिखाई के बाद तो यह चीज प्रत्येक समझदामर व्यक्ति को मान लेनी चाहिए। गाँव और क़स्बों में गिद्धों की तरह मृत व्यक्तियों के घरों में मिठाईयों पर टूट पड़ते लोगों की तस्वीरें अब दिखाई नहीं देनी चाहिए।
इस कुरीति को मिटाने का एक ही उपाय है कि
आओ आप और हम ये सपथ ले की हम इस प्रकार के आयोजनों में भोजन नही करेंगे
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जानिए ग्राम पंचायत टकरावद में किस किस का नाम प्रधानमंत्री आवास योजना में आया है
Unknown
दिसंबर 02, 2017
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फुले ब्रिगेड बिहार का प्रथम राज्य स्तरीय कार्यकर्त्ता सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न
Unknown
दिसंबर 02, 2017
फुले ब्रिगेड बिहार का प्रथम राज्य स्तरीय कार्यकर्त्ता सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न:-
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आज दिनांक 30-11-2017 को वार(औरंगाबाद) में आयोजित सम्मेलन का उद्घाटन फुले ब्रिगेड के राष्ट्रीय संयोजक माननीय भाई सी. पी. सैनी जी के द्वारा किया गया। सम्मेलन की अध्यक्षता फुले ब्रिगेड बिहार के प्रदेशाध्यक्ष भाई निरंजन कुमार मालाकार जी ने की तथा मंच संचालक की भूमिका फुले ब्रिगेड औरंगाबाद के जिलाध्यक्ष बैद्यनाथ मालाकार जी एवं फुले ब्रिगेड बेगूसराय के उपाध्यक्ष कृष्ण मोहन भारती उर्फ़ सुमन माली ने निभाई। इस सम्मलेन में फुले ब्रिगेड के राष्ट्रीय संयोजक भाई सी. पी. सैनी जी , राजस्थान के प्रदेश सचिव भाई अतुल सैनी जी , फुले ब्रिगेड बिहार के लगभग सभी सम्मानित पदाधिकारी एवं अन्य राज्यों के अपने समाज बन्धु के अलावा स्थानीय स्वजाति गणमान्य बन्धु ने अपने -अपने विचार दिए।
इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि फुले ब्रिगेड के राष्ट्रीय संयोजक भाई सी. पी. सैनी जी, भाई अतुल सैनी जी, फुले ब्रिगेड बिहार के प्रदेशाध्यक्ष माननीय निरंजन कुमार मालाकार जी, उपाध्यक्ष गौतम मालाकार उर्फ़ गौतम बजाज जी, प्रभारी अनुज कुमार सैनी जी, मुख्य संरक्षक श्री प्रकाश मालाकार जी, संरक्षक नागेन्द्र रंजन जी, मगध प्रमण्डल प्रभारी अभिषेक कुमार भगत जी, पूर्णिया प्रमण्डल प्रभारी सौरभ कुमार मालाकार जी, औरंगाबाद जिलाध्यक्ष बैद्यनाथ मालाकार जी, मोतिहारी जिलाध्यक्ष ताराचन्द्र भगत जी, कटिहार जिलाध्यक्ष अरुण मालाकार जी, बेगूसराय जिलाध्यक्ष प्रवीण कुमार उर्फ मुन्ना मालाकार जी, दाऊद नगर अनुमंडल प्रमुख बसंत कुमार मालाकार जी, विकाश चंद्र सैनी (कोलकाता), राजेंद्र कुमार भाटी (छत्तीसगढ़), आशा मल्होत्रा(औरंगाबाद), प्रदीप मालाकार(बेगूसराय), बब्बन भगत(सासाराम), चन्दन मालाकार(औरंगाबाद) एवं अन्य वक्ताओं के द्वारा फुले ब्रिगेड संगठन के विस्तार, भारत सरकार को महात्मा ज्योतिबा फुले दंपत्ति को भारत रत्न से सम्मानित करने , माली समाज के उत्थान से सम्बंधित बातों पर चर्चा हुई तथा फुले ब्रिगेड बिहार के द्वारा अब तक समाज के प्रति किये गए कार्यों की समीक्षा की गई।
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आपका भाई मुरारी कुमार मालाकार मीडिया प्रभारी फूले ब्रिगेड बेगुसराय संपर्क सूत्र 8405986604
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शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017
*फूले ब्रिगेड मध्यप्रदेश आभार संदेश*
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
इतिहास में पहली बार इतिहास रचा माली समाज ने मध्यप्रदेश मे समाज के राष्ट्रीय संघठन के आवाह्न पर मध्यप्रदेश मे पहली बार महात्मा ज्योतिबा फुले जी की पुण्यतिथि पर 32 जगह से भी ज्यादा जगह हुए कही छोटे बडे आयोजन सभी ने अपने अपने स्थर पर किये जिसमें सबसे अच्छी बात तो यह निकलर सामने आईं के 80℅ आयोजन तो पहली बार हुए जिसमें समाज की युवा शक्ति और महिला शक्ति ने बडचडकर हिस्सा लिया और जागरूकता दिखाई । और हमारी समाज की शान, सामाजीक क्रांति के अग्रदूत महात्मा ज्योतिबा फुले के जीवन के बारे मे समझा ।
*फुले ब्रिगेड आईटी सेल के सभी पदाधिकारीयो ने सोशमिडीया,इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिन्ट मिडिया और सुत्रों से जानकारी जुटाई जो रात दिन नजर बनाए रखते है समाज की हर तरह की एक्टीविटीज पर ।*
बहोत ही सहराहनी कार्य हुए समाज के युवाओं ने महात्मा ज्योतिबा फुले को जाना और उनका चितरण भी किया किस प्रकार महात्मा जी अपने जीवन मे कठिन प्रयास करके आज हमें वो जगह दिलाइ जहा आज हमें जातीगत भेदभाव और महिलाओ को शिक्षा मे बराबरी का अधिकार जैसे कही प्रकार की समाजीक कुरीतियो से उन्हो ने हमें मुक्त कराया । यही वो सबसे पहले शख्श थे जिन्हौने ब्राह्मण वाद के खिलाफ जाकर बिना पंडित पुजारीयो के शादीयां कर वाई और उन शादीयो को कानुनी मान्यता भी दिलाई ।
*एक बार पुनः समाज के राष्ट्रीय संघठन के सभी पदाधिकारीयो की और से आप सभी का आभार..। धन्यवाद नही कहेगें क्योंकि यह हमारा ही काम है जो हमारी समाज के लोग बहोत पहले कर लेते तो आज हर जैब महात्मा ज्योतीराव होते । पर दुःख तो हमें इस बात पर आज भी होता हैं की कुछ लोग आज भी इन्है अपने सवार्थ के लिए याद करते हैं ।*
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इतिहास में पहली बार इतिहास रचा माली समाज ने मध्यप्रदेश मे समाज के राष्ट्रीय संघठन के आवाह्न पर मध्यप्रदेश मे पहली बार महात्मा ज्योतिबा फुले जी की पुण्यतिथि पर 32 जगह से भी ज्यादा जगह हुए कही छोटे बडे आयोजन सभी ने अपने अपने स्थर पर किये जिसमें सबसे अच्छी बात तो यह निकलर सामने आईं के 80℅ आयोजन तो पहली बार हुए जिसमें समाज की युवा शक्ति और महिला शक्ति ने बडचडकर हिस्सा लिया और जागरूकता दिखाई । और हमारी समाज की शान, सामाजीक क्रांति के अग्रदूत महात्मा ज्योतिबा फुले के जीवन के बारे मे समझा ।
*फुले ब्रिगेड आईटी सेल के सभी पदाधिकारीयो ने सोशमिडीया,इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिन्ट मिडिया और सुत्रों से जानकारी जुटाई जो रात दिन नजर बनाए रखते है समाज की हर तरह की एक्टीविटीज पर ।*
बहोत ही सहराहनी कार्य हुए समाज के युवाओं ने महात्मा ज्योतिबा फुले को जाना और उनका चितरण भी किया किस प्रकार महात्मा जी अपने जीवन मे कठिन प्रयास करके आज हमें वो जगह दिलाइ जहा आज हमें जातीगत भेदभाव और महिलाओ को शिक्षा मे बराबरी का अधिकार जैसे कही प्रकार की समाजीक कुरीतियो से उन्हो ने हमें मुक्त कराया । यही वो सबसे पहले शख्श थे जिन्हौने ब्राह्मण वाद के खिलाफ जाकर बिना पंडित पुजारीयो के शादीयां कर वाई और उन शादीयो को कानुनी मान्यता भी दिलाई ।
*एक बार पुनः समाज के राष्ट्रीय संघठन के सभी पदाधिकारीयो की और से आप सभी का आभार..। धन्यवाद नही कहेगें क्योंकि यह हमारा ही काम है जो हमारी समाज के लोग बहोत पहले कर लेते तो आज हर जैब महात्मा ज्योतीराव होते । पर दुःख तो हमें इस बात पर आज भी होता हैं की कुछ लोग आज भी इन्है अपने सवार्थ के लिए याद करते हैं ।*
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